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कमीशनखोरी की भेंट चढ़ा अटल परिसर! भुगतान के लिए ठेकेदार आमरण अनशन पर, नपं अध्यक्ष–सीएमओ की चुप्पी सवालों के घेरे में

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कमीशनखोरी की भेंट चढ़ा अटल परिसर! भुगतान के लिए ठेकेदार आमरण अनशन पर, नपं अध्यक्ष–सीएमओ की चुप्पी सवालों के घेरे में
कोरबा–छुरीकला। नगर पंचायत छुरीकला में कमीशनखोरी और लचर प्रशासनिक सिस्टम एक बार फिर बेनकाब हो गया है। अटल परिसर निर्माण एवं मूर्ति स्थापना जैसे प्रतिष्ठित कार्य को पूरा किए 6 माह से अधिक समय बीत जाने के बावजूद ठेकेदार को आज तक भुगतान नहीं मिला। हैरानी की बात यह है कि कार्य का हैंडओवर और लोकार्पण भी हो चुका है, फिर भी फाइलें दफ्तरों में धूल फांक रही हैं।

भुगतान नहीं मिलने से त्रस्त ठेकेदार अनिल अग्रवाल ने पहले ही नगर पंचायत सीएमओ को चेतावनी दी थी कि यदि 9 फरवरी 2026 तक भुगतान नहीं हुआ तो 10 फरवरी से अटल जी की प्रतिमा के सामने आमरण अनशन किया जाएगा। प्रशासनिक टालमटोल से तंग आकर ठेकेदार ने मंगलवार सुबह 11 बजे अटल परिसर के सामने आमरण अनशन शुरू कर दिया।
अनशन से ठीक पहले ठेकेदार को “आज ही चेक कट जाएगा” का झांसा देकर रोकने की कोशिश की गई, लेकिन आश्वासन फिर खोखले साबित हुए। सीएमओ द्वारा टीएल मीटिंग से लौटकर भुगतान कराने का संदेश जरूर भिजवाया गया, परंतु कार्यालय समय समाप्त होने तक कोई चेक जारी नहीं हुआ।
अध्यक्ष की चुप्पी पर सवाल
पूरे मामले में नगर पंचायत अध्यक्ष की भूमिका भी संदेह के घेरे में है। शीर्ष जनप्रतिनिधि होने के बावजूद न तो अनशन से पहले और न ही अनशन शुरू होने के बाद कोई संज्ञान लिया गया। भुगतान के निर्देश, मध्यस्थता या अनशन तुड़वाने की पहल न करना उनकी उदासीनता को उजागर करता है।
कांग्रेस और ठेकेदार संघ उतरे समर्थन में
ठेकेदार के समर्थन में ब्लॉक कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष गोरेलाल यादव और जिला ठेकेदार संघ सचिव एवं नगर निगम ठेकेदार संघ अध्यक्ष असलम खान अनशन स्थल पर पहुंचे। असलम खान ने आरोप लगाया कि यह सिर्फ एक ठेकेदार की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की समस्या है। सरकार द्वारा लागू 40:40:20 भुगतान अनुपात को उन्होंने ठेकेदारों के लिए “शोषणकारी व्यवस्था” बताया।
उन्होंने कहा कि हर किश्त के लिए अलग-अलग स्तर पर कार्य पूर्ण होने के बावजूद भुगतान में महीनों लग जाते हैं। भुगतान के इंतजार में ठेकेदार काम रोक नहीं सकता, क्योंकि समयवृद्धि का दंड उसी को भुगतना पड़ता है। नतीजा यह है कि नगर पालिका, पंचायत और निगम में काम करने वाले ठेकेदार आर्थिक रूप से टूटते जा रहे हैं।
बड़ा सवाल
जब अधूरे कार्यों पर पूरा भुगतान संभव है, तो पूरा काम करने वाले ठेकेदार को महीनों क्यों घसीटा जा रहा है?
क्या भुगतान में देरी के पीछे कमीशन का खेल है?
अब निगाहें प्रशासन और जनप्रतिनिधियों पर टिकी हैं—क्या अनशन टूटेगा या व्यवस्था की चुप्पी और भारी पड़ेगी?
Ritesh Gupta
Author: Ritesh Gupta

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