कोरबा। जिला खनिज संस्थान न्यास (DMF) से स्वीकृत कार्यों की जानकारी छुपाने के लिए जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) कार्यालय ने ऐसा तर्क गढ़ा, जिसे न सिर्फ अपीलीय अधिकारी ने सिरे से खारिज कर दिया, बल्कि उसे “नियमों से परे और अस्वीकार्य” मानते हुए 10 दिनों के भीतर जानकारी देने का स्पष्ट आदेश भी पारित किया। इसके बावजूद, एक माह बीत जाने के बाद भी न तो आदेश का पालन हुआ और न ही जिम्मेदारों पर कोई असर दिखाई दिया। यह पूरा घटनाक्रम सूचना का अधिकार अधिनियम जैसे केंद्रीय कानून की खुलेआम अवहेलना और प्रशासनिक उद्दंडता का उदाहरण बन गया है।
दरअसल, जनसूचना अधिकारी सह जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय कोरबा से चालू वित्तीय वर्ष 2025-26 में पत्र क्रमांक 7329 के माध्यम से 08 सितंबर 2025 तक की स्थिति में DMF से स्वीकृत कार्यों के प्रशासकीय स्वीकृति आदेशों की सत्यप्रतिलिपि मांगी गई थी। यह जानकारी व्यापक लोकहित से जुड़ी थी, लेकिन जनसूचना अधिकारी ने 30 दिनों की वैधानिक समय-सीमा के भीतर न तो जानकारी दी और न ही कोई उत्तर देना आवश्यक समझा। इससे क्षुब्ध होकर आवेदक को 15 अक्टूबर 2025 को प्रथम अपील दायर करनी पड़ी।

27 नवंबर 2025 को संभागीय स्तर पर हुई सुनवाई के दौरान DEO कार्यालय के प्रतिनिधि ने जो तर्क प्रस्तुत किया, उसने पूरे तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। कहा गया कि अक्टूबर 2025 में DMF के प्रभारी अधिकारी का स्थानांतरण हो गया था और “विधिवत प्रभार सूची नहीं मिलने” के कारण जानकारी उपलब्ध कराना संभव नहीं है। इस बेतुके और हास्यास्पद तर्क को अपीलीय अधिकारी सह संयुक्त संचालक शिक्षा, संभाग बिलासपुर ने तुरंत खारिज कर दिया और सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत 10 दिनों के भीतर संपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराने का आदेश पारित कर प्रकरण नस्तीबद्ध कर दिया।
03 दिसंबर 2025 को पत्र क्रमांक सू.अधि./प्र.क्र.397/2025/5552 के माध्यम से पारित आदेश की प्रतिलिपि आवेदक को भी प्रदान की गई, लेकिन आदेश के बावजूद आज तक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई। यह न केवल अपीलीय अधिकारी के आदेश की अवहेलना है, बल्कि केंद्रीय कानून की सीधी अवमानना भी है। मजबूरन 01 जनवरी 2026 को राज्य सूचना आयोग के मुख्य सूचना आयुक्त के समक्ष द्वितीय अपील दायर की गई और इसकी प्रतिलिपि संचालक लोक शिक्षण, अपीलीय अधिकारी तथा कलेक्टर कोरबा को अनुशासनात्मक कार्रवाई हेतु भेजी गई।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि राज्य सूचना आयोग में मामलों की अधिकता का फायदा उठाकर कई जनसूचना अधिकारी जानबूझकर आदेशों को नजरअंदाज करते हैं। उन्हें पता होता है कि जब तक सुनवाई की बारी आएगी, तब तक उनका तबादला हो चुका होगा। यही वजह है कि सूचना का अधिकार अधिनियम छत्तीसगढ़ में कई जगह मज़ाक बनकर रह गया है।
यह पूरा मामला सिर्फ एक RTI आवेदन तक सीमित नहीं है, बल्कि DMF जैसे संवेदनशील और जनहित से जुड़े फंड की पारदर्शिता पर सीधा प्रश्नचिह्न लगाता है। दो माह बाद भी प्रभारी अधिकारी द्वारा विधिवत प्रभार न सौंपे जाने की बात अगर सही है, तो उस अधिकारी के खिलाफ अब तक एफआईआर या विभागीय कार्रवाई क्यों नहीं हुई? और अगर यह महज बहाना है, तो फिर स्वीकृत कार्यों की जानकारी छुपाने के पीछे किसका डर और किसका संरक्षण है?
पूर्व में भी समग्र शिक्षा विभाग द्वारा इसी तरह के तर्कों के सहारे DMF से जुड़ी जानकारियां रोकी गई थीं, जिसकी शिकायत पीएमओ तक पहुंची, लेकिन राज्य स्तर पर जांच आज भी प्रक्रियाधीन है। ऐसे में यह सवाल और गहराता है कि आखिर जवाबदेही तय करने की इच्छाशक्ति कहां है।
नवपदस्थ कलेक्टर कुणाल दुदावत ने मीडिया से पहली चर्चा में ही सूचना के अधिकार को लेकर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की बात कही थी। वरिष्ठ पत्रकार गेंदलाल शुक्ल द्वारा उठाए गए सवालों पर कलेक्टर ने स्पष्ट कहा था कि जैसे दंतेवाड़ा में उन्होंने RTI को गंभीरता से लागू किया, वैसे ही कोरबा में भी आमजन को समस्त देय जानकारी पारदर्शिता के साथ उपलब्ध कराई जाएगी।
अब देखना यह है कि अपीलीय आदेश की अवहेलना और खुलेआम अनुशासनहीनता के इस मामले में कलेक्टर स्वयं संज्ञान लेते हैं या फिर एक और शिकायत, एक और अपील और एक और लंबी प्रक्रिया का इंतजार किया जाएगा।
Author: Ritesh Gupta
Professional JournalisT








