शिकायत के बाद भी कार्रवाई नहीं, मिशल में बदलाव के आरोप; अब बेमेतरा बैंक लिंक और अफसर कनेक्शन ने बढ़ाई सियासी-प्रशासनिक हलचल
गौरेला-पेंड्रा-मरवाही। तहसील सकोला के ग्राम सेखवा में शासकीय जमीन से जुड़ा मामला अब बड़े घोटाले का रूप लेता नजर आ रहा है। बड़े झाड़ जंगल मद की बेशकीमती सरकारी भूमि को कथित रूप से फर्जी पट्टा बनवाकर निजी नाम पर दर्ज कराने के आरोप लगे हैं। इस पूरे मामले में सेखवा निवासी शिक्षक शंकर प्रजापति और उनकी पत्नी बेबी लता का नाम सामने आ रहा है।
आरोप है कि पेंड्रा-कोटमी-मरवाही स्टेट हाईवे से लगी इस जमीन को राजस्व अधिकारियों की कथित मिलीभगत से सरकारी रिकॉर्ड से हटाकर निजी स्वामित्व में बदल दिया गया। सबसे गंभीर पहलू यह बताया जा रहा है कि केवल सामान्य दस्तावेजों में ही नहीं, बल्कि जमीन के मूल अभिलेख “मिशल” में भी बदलाव कर दिया गया—जो किसी भी भूमि की वास्तविक स्थिति तय करता है।
मिशल में बदलाव—घोटाले का सबसे बड़ा बिंदु
सूत्रों के मुताबिक, बड़े झाड़ जंगल मद की भूमि को सीधे मिशल में परिवर्तित कर निजी भू-स्वामी दर्ज कर दिया गया। यहां तक कि एक ही खसरा नंबर के अलग-अलग मिशल होने की बात भी सामने आ रही है, जो पूरे राजस्व सिस्टम की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
2024 में शिकायत, 2025 में लोन—कड़ी जुड़ती गई
बताया जाता है कि वर्ष 2024 में इस मामले की लिखित शिकायत दस्तावेजों सहित जिला प्रशासन को दी गई थी। मामला कलेक्टर स्तर पर TL में भी शामिल हुआ, लेकिन कार्रवाई के बजाय फाइल ही गायब होने के आरोप लगे। हैरानी की बात यह है कि जिस जमीन को लेकर विवाद और जांच की मांग थी, उसी लगभग 12 एकड़ भूमि को वर्ष 2025 में गिरवी रखकर करोड़ों रुपये का लोन निकाल लिया गया।
बेमेतरा बैंक कनेक्शन—मामला हुआ और संवेदनशील
सबसे बड़ा सवाल यह है कि गौरेला, बिलासपुर या रायपुर जैसे नजदीकी शहरों को छोड़कर जमीन को बेमेतरा स्थित IDFC बैंक की एक छोटी शाखा में ही गिरवी क्यों रखा गया।
यहीं से मामला और संवेदनशील हो जाता है, क्योंकि चर्चा है कि जिले की एक शीर्ष महिला अधिकारी का बेमेतरा से पुराना कनेक्शन रहा है और उनका निजी खाता भी उसी बैंक शाखा में बताया जा रहा है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इस एंगल ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।
शंकर कनेक्शन—पहले भी उठते रहे आरोप
स्थानीय लोगों का दावा है कि सरकारी जमीन से जुड़े मामलों में शंकर प्रजापति का नाम पहले भी सामने आता रहा है। ग्राम पंचायत मड़ई में फर्जी डायवर्सन के आरोप भी चर्चा में हैं, जिससे यह मामला और संदिग्ध बनता जा रहा है।
सिस्टम पर सीधे सवाल
सरकारी जंगल भूमि निजी कैसे हुई?
मिशल जैसे मूल रिकॉर्ड में बदलाव किसके आदेश से हुआ?
2024 की शिकायत के बाद भी कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
फाइल कैसे गायब हुई?
विवादित जमीन पर बैंक ने लोन कैसे स्वीकृत किया?
और सबसे बड़ा सवाल—कौन है वो ‘टॉप महिला अफसर’ जिसका बेमेतरा कनेक्शन चर्चा में है?
अब क्या करेगा प्रशासन?
मामले ने तूल पकड़ लिया है और अब उच्चस्तरीय जांच, राजस्व रिकॉर्ड की फोरेंसिक जांच और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की पड़ताल की मांग तेज हो गई है। यदि समय रहते निष्पक्ष और पारदर्शी जांच नहीं हुई, तो यह मामला सिर्फ एक जमीन घोटाले तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे प्रशासनिक सिस्टम की साख पर बड़ा सवाल बन सकता है।
Author: Ritesh Gupta
Professional JournalisT








