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गुमराह किया गया ट्रांसफर आदेश! – DFO मरवाही और प्रभारी स्टेनो की भूमिका पर उठे सवाल? क्या पुरुषोत्तम कश्यप और भूपेंद्र साहू ने विभागीय प्रक्रिया को बनाया खिलौना?

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गुमराह किया गया ट्रांसफर आदेश! – DFO मरवाही और प्रभारी स्टेनो की भूमिका पर उठे सवाल
मरवाही/गौरेला-पेंड्रा-मरवाही: मरवाही वनमंडल में वर्षों से पदस्थ दागी कर्मचारियों के स्थानांतरण को लेकर एक और बड़ा खुलासा सामने आया है। आरोप है कि शासन की स्पष्ट मंशा और प्रभारी मंत्री की स्वीकृति के बावजूद, विभाग के ही कुछ लोगों ने स्थानांतरण आदेश को तोड़-मरोड़ कर अपनी सुविधा अनुसार प्रस्तुत कर शासन की प्रक्रिया को गुमराह किया।
सूत्रों के अनुसार, यह स्थानांतरण सूची स्थानीय जनप्रतिनिधियों और आम जनता द्वारा लगातार की जा रही शिकायतों के आधार पर तैयार की गई थी। सूची को कलेक्टर कार्यालय द्वारा सत्यापन हेतु मरवाही वनमंडल के डीएफओ को भेजा गया। लेकिन वहां से इस लिस्ट में खेल शुरू हो गया। आरोप है कि प्रभारी स्टेनो ने उक्त सूची में व्यक्तिगत हित साधने के लिए दखल दिया, और नए डीएफओ से भ्रमात्मक आधारों पर “स्थानांतरण के प्रतिकूल टिप्पणी” लिखवा ली। यही पत्र फिर कलेक्टर कार्यालय भेजा गया, जिससे संपूर्ण प्रक्रिया ही उलट गई।
सूत्रों का दावा है कि इस पूरे घटनाक्रम में प्रभारी स्टेनो की बड़ी भूमिका रही। विभागीय पद पर वर्षों से जमे हुए यह कर्मचारी न केवल जनता के बीच अपनी खराब छवि के लिए पहचाने जाते हैं, बल्कि इन पर मनरेगा और कैंपा जैसे करोड़ों के घोटाले में संलिप्तता के भी गंभीर आरोप हैं।
इस मामले में जिन दो नामों की सबसे अधिक चर्चा हो रही है वे हैं – पुरुषोत्तम कश्यप और भूपेंद्र साहू। दोनों पर विभिन्न विभागीय अनियमितताओं, वित्तीय भ्रष्टाचार और पद का दुरुपयोग करने के आरोप वर्षों से लगते आ रहे हैं। इसके बावजूद इनका एक ही स्थान पर वर्षों से टिके रहना, विभागीय संरक्षण और साठगांठ की पोल खोलता है।
वर्षों से जमे हैं पद पर – सवालों के घेरे में पुरुषोत्तम कश्यप और भूपेंद्र साहू
मरवाही वनमंडल में पुरुषोत्तम कश्यप और भूपेंद्र साहू वर्षों से एक ही पद पर जमे हुए हैं। इतने वर्षों में कई डीएफओ बदले, नीतियाँ बदलीं, लेकिन इन दोनों के प्रभार में कभी कोई परिवर्तन नहीं हुआ। यह स्थिति स्वयं में संदेहास्पद है और विभागीय निष्क्रियता व सांठगांठ की ओर इशारा करती है।
जबकि इसी विभाग में कई अन्य अधिकारी मनरेगा, कैंपा और वन संरक्षण मद जैसे मामलों में कथित भ्रष्टाचार के चलते निलंबित या हटाए जा चुके हैं, फिर भी इन दोनों कर्मियों को न केवल संरक्षित किया गया, बल्कि इनकी स्थिति और भी मजबूत होती गई।
ऐसे में यह सवाल उठना लाज़मी है –
क्या विभागीय कार्रवाई केवल चुनिंदा लोगों तक सीमित है?
क्या पुरुषोत्तम कश्यप और भूपेंद्र साहू को कोई “ऊपरी संरक्षण” प्राप्त है?
इन सबके बीच, प्रभारी मंत्री द्वारा जारी स्थानांतरण सूची को इन कर्मचारियों द्वारा प्रभावित किया जाना न केवल प्रशासनिक तंत्र की कमजोरी दिखाता है, बल्कि यह भी स्पष्ट करता है कि यह केवल ट्रांसफर का मामला नहीं, बल्कि वृहद स्तर पर व्याप्त एक तंत्रबद्ध भ्रष्टाचार का हिस्सा है।

Ritesh Gupta
Author: Ritesh Gupta

Professional JournalisT

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